Birth of Sain Samaj

शब्द नाई संस्कृत भाषा की जड़ नय – जिसका मतलब है नेतृत्व के लिए । सैन लोग चंद्रवंशी वंश के वैदिक क्षत्रिय हैं ।
सैन पारंपरिक रूप से नाई थे, लेकिन उनकी राज्यव में अन्य विशेष भूमिका भी थी। वे प्राचीन सर्जन, रणभूमि के प्रवृत्त लोगों की तरह, उस्तरा से निपटने में उनकी विशेषज्ञता की वजह से नाई थे। वे पारंपरिक दूत के रूप में और नाजुक मामलों में बीच बचाव मे इस्तेमाल किया गये । सैन जनों ने विभिन्न राज्यों के बीच राजदूत के रूप में काम किया है । वे पारंपरिक रूप से शादी की पार्टियों का नेतृत्व करते है और गांवों और समुदायों के बीच संदेशों को लाया और ले जाया करते थे । वे कृष्ण के अनुयायी हैं और भगवद् गीता की शिक्षाओं द्वारा पालित है। विशेष रूप से सांख्य योग और कर्म योग। वे रहस्यों को रखने के लिए, एक सख्ती से अनुशासित जीवन के लिए, और उनके शरीर को स्वच्छ , सक्रिय और शारीरिक रूप से फिट रखने के लिए जाना जाते है।

“न्यायी” से बना “नाई “
” नाई ” शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘नाय’ से मानी गयी है, जिसका हिन्दी अर्थ है- नेतृत्व करने वाला अर्थात् वह जो समाज का नेतृत्व करे या न्यायी – न्याय करे ।
“नाई” जाति क्षत्रिय वर्ण की चन्द्रवंश शाखा के अन्तर्गत वर्गीकृत है और वैदिक क्षत्रिय है, जो वैदिक कालीन शासक जाति है।
इस जाति के अनेक महान सम्राट, राजा, मंत्री, योद्धा, वीर रक्षक, अंगरक्षक, प्रसिद्ध वैध्य, पंडित (विद्वान), ऋषि, सन्त,योगी, आचार्य आदि श्रेष्ठ व्यक्तित्व रहे हैं।
उत्तर भारतीय न्यायी-”क्षत्रिय- न्यायी”
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महापदम नन्द-नाई ( न्यायी ) और उनकी शिशु नागवशी क्षत्रिय-पत्नी की सताने ”नन्द” वही महापदम नन्द-नाई ( न्यायी ) और उनकी मुरा-पत्नी की सतान ”मौर्य’ के रूप मे जाने गये.
उत्तर – मध्य भारत में निवास करने वाला नाई ( न्यायी ) समुदाय की उत्पत्ति “युगपुरुष” चक्रवर्ती सम्राट ‘एकक्षत्र’ महाराज श्री महापदम नन्द जी से हुई है।
इसीलिए दक्षिण भारत को छोड़कर भारत वर्ष के अन्य भागों में रहने वाला यह समुदाय मूलतः क्षत्रिय पृष्ठभूमि का चन्द्रवंशीय क्षत्रिय ( नन्द क्षत्रिय ) है
मगध पर शक्तिशाली#नन्द_राजवंश का शासन था, उसका अधिपति सम्राट_महापदम_नन्द था, जो अपने बाहुबल, पराक्रम, राजनैतिक चातुर्य, विस्तारवादी नीति से मगध को एक समृद्ध साम्राज्य में परिवर्तित कर रहा था। सम्राट महापदम नन्द ने अपनी अभूतपूर्व युद्ध नीति से सभी १६ महाजनपदों को विजित कर भारत वर्ष पर नन्द राजवंश का ‘एकक्षत्र’ शासन स्थापित किया ।
जय जय “न्यायी “नन्द राजवंश” समाज की जय हो ।